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“बिरहिनी मंदिर दियना बार” ओशो की प्रेम, विरह और भक्ति की सूक्ष्म तरंगों पर आधारित एक गहन कृति है, जिसमें वे वियोग को पीड़ा नहीं, बल्कि प्रेम की अग्नि में पककर जागने की प्रक्रिया के रूप में समझाते हैं। इस पुस्तक में ओशो बताते हैं कि विरह का अर्थ खो जाना नहीं—भीतर जागना है; प्रीतम से दूर होना नहीं—प्रीतम की उपस्थिति को तड़प में महसूस करना है।
ओशो प्रेम को मिलन से अधिक विरह में खिला हुआ कमल बताते हैं, जहाँ हर आह ध्यान में बदल जाती है और हर प्रतीक्षा जागृति की सीढ़ी बन जाती है। “मंदिर दियना बार” का अर्थ यहाँ केवल दीप जलाना नहीं—अपने हृदय में प्रतीक्षा का प्रकाश जलाए रखना है, ताकि प्रीतम आए या न आए, भीतर का मंदिर उजाला ना छोड़े।
यह कृति उन खोजियों के लिए है जो प्रेम को स्वामित्व नहीं, बल्कि समर्पण, तड़प और आत्म-अनुभूति की ऊर्जा के रूप में समझना चाहते हैं। ओशो बताते हैं—जब प्रेम विरह बन जाए, और विरह प्रार्थना, तब प्रेमी और प्रिय के बीच की दूरी नहीं रहती—सिर्फ अनुभव बचता है, सिर्फ उपस्थिति।

Publisher: A REBEL BOOK

Language : HINDI

Binding: HARD COVER

Pages : 325