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“जिन खोजा तिन पाया” ओशो की आत्म-अन्वेषण, जिज्ञासा और आंतरिक जागरण पर आधारित अद्भुत कृति है, जो पाठक को यह समझने की प्रेरणा देती है कि सत्य बाहर कहीं नहीं—आपके भीतर ही प्रतीक्षारत है। इस पुस्तक में ओशो स्पष्ट करते हैं कि खोज तभी फल देती है जब तलाश ईमानदार, गहरी और संपूर्ण हो। आधा-अधूरा प्रयास भ्रम देता है, लेकिन पूर्ण समर्पण—जागृति और साक्षात्कार का द्वार खोल देता है।
ओशो बताते हैं कि जीवन का सार प्रश्नों में नहीं, बल्कि खोज की आग में छिपा है। यहाँ भक्ति और बुद्धि विरोधी नहीं, बल्कि खोज के दो पंख हैं—जो साधक को खुद से मिलने की यात्रा पर उड़ान देते हैं। यह कृति अहंकार की दीवारें गिराकर जागरूकता के रास्ते पर चलने का संदेश देती है, जहाँ हर कदम भीतर की रोशनी से जगमगाता है।
जो पाठक खुद को, अपने उद्देश्य को और जीवन की गहराई को तलाशना चाहते हैं—उनके लिए “जिन खोजा तिन पाया” आत्मिक यात्रा का नक्शा है, जो मार्गदर्शन भी करता है और प्रेरणा भी।

Publisher: A REBEL BOOK

Language : HINDI

Binding: HARD COVER

Pages : 388