“जो घर बारे आपना” ओशो के गहन और जागरणकारी प्रवचनों का संग्रह है, जो संत परंपरा—विशेषतः कबीर की वाणी—की आत्मा को आधुनिक दृष्टि से उजागर करता है। शीर्षक स्वयं एक संकेत है: जब तक मनुष्य अपने भीतर के ‘घर’ को नहीं पहचानता, तब तक बाहरी संसार में भटकन ही उसका भाग्य बनती है।
इस पुस्तक में ओशो बताते हैं कि असली घर कोई भौतिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ शांति, प्रेम और साक्षीभाव का निवास होता है। वे कबीर की पंक्तियों के माध्यम से अहंकार, मोह, सामाजिक बंधनों और झूठी पहचान से परे जाने का संदेश देते हैं।
ओशो की व्याख्या गहरी, काव्यात्मक और सीधी है—जो पाठक को भीतर झाँकने पर मजबूर करती है। वे समझाते हैं कि जब व्यक्ति अपने “भीतर के घर” को जान लेता है, तब उसे बाहरी आश्रय की आवश्यकता नहीं रहती।
यह पुस्तक ध्यान, आत्म-खोज और आध्यात्मिक जागृति की राह पर चलने वालों के लिए अत्यंत प्रेरक है। यह हमें याद दिलाती है कि असली यात्रा बाहर नहीं, भीतर की ओर है।
Publisher: MANOJ PUBLICATIONS
Language : Hindi
Binding: PAPER BACK
Pages : 102

