“पूंजी: राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना (भाग 3)” कार्ल मार्क्स की ऐतिहासिक और गहन वैचारिक कृति का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इस पुस्तक में मार्क्स ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के जटिल ढांचे, लाभ की दर, पूंजी संचय और आर्थिक संकटों के मूल कारणों का विस्तार से विश्लेषण किया है।
इस भाग में लेखक यह समझाते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था में लाभ (Profit), ब्याज (Interest), किराया (Rent) और पूंजी संचय किस प्रकार कार्य करते हैं और ये तत्व समाज में वर्ग संरचना और आर्थिक असमानता को कैसे प्रभावित करते हैं। मार्क्स ने आर्थिक व्यवस्था के उन पहलुओं को उजागर किया है जो अक्सर सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देते, लेकिन समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
“पूंजी (भाग 3)” केवल अर्थशास्त्र की पुस्तक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक संरचनाओं की गहरी समझ प्रदान करती है। यह ग्रंथ पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि आर्थिक शक्ति किस प्रकार समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन या असंतुलन पैदा करती है।
यह हिंदी संस्करण छात्रों, शोधकर्ताओं और उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो मार्क्सवाद, समाजशास्त्र, राजनीतिक अर्थशास्त्र और पूंजीवाद की आलोचना को गंभीरता से समझना चाहते हैं। “पूंजी” का यह भाग आर्थिक सिद्धांतों के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली स्रोत माना जाता है।
Publisher: PROGRESS PUBLISHERS PRAGATI PRAKSHAN MOSCOW
Language : HINDI
Binding: Hard Cover
Pages : 815

