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“क्रांतिबीज” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि चेतना में बोया गया वह बीज है जो जीवन को भीतर से बदलने की क्षमता रखता है। ओशो का यह प्रवचन-संग्रह हमें याद दिलाता है कि हर इंसान के भीतर एक संभावित क्रांति छुपी हुई है — बस उसे जागने की देर है।
“मैं तो बीज चला, देखना तुम कि बीज बीज न रह जाए” — यह पंक्ति जीवन की गहराई, साहस और आत्म-विकास की पुकार है।

इस पुस्तक में ओशो व्यक्तित्व परिवर्तन, आंतरिक विद्रोह, ध्यान, स्वतंत्र सोच, आध्यात्मिक जागृति और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की बात करते हैं। वे कहते हैं कि सच्ची क्रांति बाहर नहीं, भीतर घटित होती है। जब व्यक्ति अपने डर, परंपरागत सोच और झूठी मान्यताओं से मुक्त होता है, तभी वह ‘बीज’ एक विशाल वृक्ष में बदल सकता है।

यह पुस्तक युवाओं, आध्यात्मिक खोजियों और उन सभी पाठकों के लिए है जो जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना चाहते हैं। ओशो की भाषा सरल, तीक्ष्ण और झकझोर देने वाली है — जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती है और भीतर सोई चेतना को जगाती है।

यह किताब आत्म-परिवर्तन, चेतना की क्रांति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सशक्त मार्गदर्शन है।

Publisher: A REBEL BOOK

Language : HINDI

Binding: Hard Cover

Pages : 215