“कहूँ तो किससे कहूँ, सुनता कौन है? – नेति नेति” भगवान श्री रजनीश की एक अत्यंत गहन और आत्म-संशय को तोड़ने वाली कृति है, जिसमें वे अस्तित्व और आत्मा की खोज को “नेति नेति” — न यह, न वह के सूत्र के माध्यम से समझाते हैं। इस पुस्तक में ओशो बताते हैं कि साधक अक्सर उत्तर ढूँढता है, लेकिन पहला सवाल यह है—“जो कह रहा हूँ, उसे सुनने वाला कौन है?”
यह कृति साधक को भीतर की खामोशी में उतरने, विचारों की परतें हटाने, और “जो बच जाता है”—उस अनकहे सत्य को पहचानने की राह दिखाती है। ओशो समझाते हैं कि सत्य किसी शब्द या विचार में नहीं, अहंकार के पीछे छुपी मौन साक्षी में प्रकट होता है।
“नेति नेति” यहाँ नकार का दर्शन नहीं—स्वयं की पहचान से परे जाने का आह्वान है। जब साधक हर परत को हटाता जाता है—शरीर, मन, स्मृति, मान्यताओं—तब अंततः शुद्ध चेतना, मौन और उपस्थिति शेष रह जाते हैं।
यह पुस्तक उन खोजियों के लिए है जो अध्यात्म को सिद्धांत नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव और आंतरिक सुनने की प्रक्रिया मानते हैं। यह कृति पूछना सिखाती है, सुनना सिखाती है—और अंततः स्वयं से मिलना सिखाती है।
Publisher: A REBEL BOOK
Language : HINDI
Binding: HARD COVER
Pages : 432

