“रोम रोम रस पीजिए” ओशो द्वारा संत–परंपरा, भक्ति–भाव और ध्यान–रस की गहराइयों पर दिया गया एक अद्भुत प्रवचन–संग्रह है, जो पाठक को “जीवन को सिर्फ समझो नहीं—उसे पीओ, जियो, महसूस करो” की ओर बुलाता है। इस पुस्तक में ओशो भक्ति को अंधविश्वास नहीं, बल्कि चेतना का मधुर रस बताते हैं—ऐसा अमृत जो शरीर के हर रोम–रोम को जीवंत कर देता है।
ओशो समझाते हैं कि भक्ति का अर्थ भीख माँगना नहीं, अस्तित्व से प्रेम करना है; ईश्वर को खोजना नहीं, स्वयं को खोल देना है। जब साधक अहंकार के खोल से बाहर आता है, तब जीवन के हर अनुभव में दिव्यता का स्वाद घुलता है—उसी को वे कहते हैं “रोम रोम रस पीजिए।”
यह कृति प्रेम, समर्पण, ध्यान और मौन को एक ही धारा में बहाती है, जहाँ साधना संघर्ष नहीं—उत्सव बन जाती है, और भक्ति आंसुओं का नहीं—आनंद का नृत्य बन जाती है। जो पाठक भक्ति को दमन से नहीं, जीवन की पूर्णता और स्वतंत्रता से समझना चाहते हैं—उनके लिए यह पुस्तक भीतर के मधुर रस का आमंत्रण है।
Publisher: A REBEL BOOK
Language : HINDI
Binding: PAPER BACK
Pages : 166

